जो चाहे मेरे यार करो, मैं गोवा में हूं...

गोवा एयरपोर्ट से बाहर निकलते ही समंदर की लहरें पैर छूएंगी.  

चहुओर देसी विदेशी अप्सरा भारत के पहले परमाणु रिएक्टर की तरह एक्टिव दिखेंगी. 

घुमावदार सड़क होगी, जिस पर चलती खुली कार से हाथ वैसे ही लहराएंगे जैसे छह उंगलियों वाले रितिक ने 'ज़िंदगी मिलेगी ना दोबारा' में लहराया था.  

मगर ये सनिमा नहीं था. हक़ीक़त थी और ये मैं था, जिसे हर तरफ सन्नाटा दिख रे ला था. 

खिड़की से झांक बराबर, कुछ नहीं मिलेगा. न कोई परायी अप्सरा, न कोई समंदर की लहरें. 

ये मेरे पापों की नहीं, किफ़ायती मन की सज़ा थी. जिसने गोवा पहुंचने की टिकट उस वक़्त की करवाई थी, जब अक्खा गोवा सो रे ला था. शास्त्रों में इसे ब्रह्म महूर्त कहा जाता है. कंजूस-अस्त्र में इसे सस्ती टिकट कहा जाता है.

जैसे पूरा भारत इन दिनों बँटा हुआ है. ठीक वैसे ही गोवा भी बँटा हुआ है. महाराष्ट्र की तरफ बढ़ो तो वो कहलाए है नॉर्थ गोवा. कर्नाटक की तरफ बढ़ो तो वो कहलाए है- साउथ गोवा. 

इन दोनों में उतना ही फ़र्क़ है, जितना जगजीत सिंह जी और बी प्राक की आवाज़ में फ़र्क़ है. इसलिए गोवा आने वाले ज़्यादातर आधे उधर जाते हैं, आधे इधर जाते हैं... बाक़ी जुआरी बीच पणजी में खड़े जहाजनुमा कसीनो में घुस जाते हैं.

हम ठहरे जगजीत जी वाले तो भैय्ये गड्डी साउथ गोवा ले ले. 

बचपन से अब तक ग्रीन गोला देखकर वेज- नॉनवेज की पहचान करती आंखें रात के अंधेरे में बहुत ज़्यादा कुछ देख नहीं पा रही थीं. पर ये जो नाक थी वो लगातार किसी जासूसी नॉवेल के इंफॉर्मर की तरह बता रही थीं कि भैय्ये मरी मछली की बदबू है ये. 

लक्ष्मण भैया बिना बात के बदनाम हैं. इस रास्ते से लंका लौटते हुए शूपर्णखा ने ख़ुद बदबू से बचने के लिए अपनी नाक काट ली होगी!

क्या मंज़र है... जहां जितना ज़्यादा पानी वहां उस बिन सबसे ज़्यादा तड़पकर मरती मछली. हर ओर यही नियम लागू, जिसे जो पसंद है उससे वो छीन लो. फिर चाहे वो तड़पकर मरने ही क्यों ना लगे.

मरी मछली के धंधे से लोगों के घर चलने और रोज़गार जैसी बातें किसी के मन में आ रही हैं तो ऐसी गंभीर बात करने वाले देशद्रोही पाकिस्तान चले जाएं. 


मीनवाइल अपन साउथ गोवा पहुंच रेले हैं. जगह का नाम है- अगोंडा. 

गोवा में समंदर किनारे छोटी-छोटी झुग्गियां होती हैं. इंग्लिश में बोले तो हट. झुग्गियों में रह चुके दिलों को इन हट का किराया पता चले तो मुंह से हट के लिए 'अबे हट' ही निकले. 

हम हठ किए बिना हट में हो लिए. इत्ते थके थे कि झट से सो लिए. 

सुबह आंख खुली तो सामने कोई नहीं था. एक विशाल समंदर था, जिसकी लहरें बार-बार पास आकर कह रही थीं कि ऐ राजा आ ना बाहर....

वैसे तो मैं सुबह उठने का शौक़ीन नहीं, पर नौकरी और घुमक्कड़ी दो ऐसी चीज़ हैं कि अगर उठना है तो उठना ही है. ये लाइन लिखकर लगा कि कोई बॉस पढ़ेगा तो क्या इससे मेरे अप्रेजल पर कोई फ़र्क़ पड़ेगा? घंटा...भर सोई आंखों ने लहरों के पास जाना चुना. हम गए. ओहो... मैं से हम. 

शादी हो गई है हमारी. अब वो दिन लद गए जब बैग उठाए कहीं भी सस्ती सी मच्छरछानी वाले कमरों में 100 रुपये देकर सो जाया करते थे. 'विद ग्रेट पावर्स, कम ग्रेट रिस्पॉन्सबिलिटी' ये बात जाल बिछाने वाला स्पाइडर मैन क्यों कह गया था? ये समझ आने लगा. 

सुबह-सुबह समंदर की लहरें बदमाशी कर रही होती हैं. वो शोर मचा रही होती हैं. जैसे आपसे रातभर की तन्हाई का हिसाब मांग रही हों. जैसे पूर्व प्रेमी या प्रेमिकाएं कहे या बिना कहे मांगती हैं. 'हाय कितने दिन बीते... तुम घर ना आए.'

ऐसी ही लहरों को जब छुओ तो स्पर्श वही रहता है जैसे सब कुछ अपना है. उस एक पल का जिया स्पर्श साथ ना बिताए वक़्त के ज़ख़्म को भर देता है. गोवा में सूरज समंदर की ओर से उगता नहीं दिखता, वो दूसरी तरफ से अपनी किरणों से लहरों को छूता है. मानो हग यू फ्रॉम द फ्रंट साइड... कह रहा हो. 

समंदर सूरज दोस्त हैं. सुबह गले मिलते हैं. शाम को साथ में सो जाते हैं. किनारे की लहरें ये रखवाली करती हैं कि किसी बीच पर कोई किनारे से समंदर के बीच में ना जाए. 

पूरा गोवा समंदर किनारे हैं. पर ज़्यादातर जगहें बीच कहलाती हैं. समंदर किनारे ही सही लगता है. बीच में तो नदियां होती हैं. दोनों तरफ के लोगों की प्यास बुझाती हुईं. नदियों को ऐसे ही याद करते हुए मैंने समंदर से एक अंजुल पानी लिया और मुंह में भरा ही था कि टूथपेस्ट का तो नहीं पता, पर मेरी आत्मा तक में नमक पहुंच गया था. 

'आ थू...' करने ही वाला था कि कुछ अंग्रेज़ नंगे पैर टहलते दिख गए. लगा कि थूका तो एक प्रतापी प्रधानमंत्री ने इतनी मेहनत से जो भारत की छवि बनाई है, वो बिगड़ जाएगी. मैं नमक हरामी नहीं कर सकता था. लिहाज़ा मैंने कैमरारूपी नज़रों के हटने का इंतज़ार किया और कैमरों के हटते ही अपनी औकात पर आ गया. इस तरह अपने देश के नमक से मैंने वफ़ादारी निभाई.

बाकी सब रोमांस अपनी जगह. पर ये कौन लोग हैं, जो घंटों-घंटों समंदर में नहा लेते हैं और अगर नहा ही लेते हैं तो किसी स्थान विशेष में पाइप और छन्नी लगाकर नमक की दुकान क्यों नहीं डाल लेते?

इन सब सवालों से सानू की. हम लौटे हट पर. वहां भैय्ये बाथरूम की कोई छत नहीं. ऊपर नारियल के पेड़ और बड़े-बड़े पत्ते. मैंने चश्मा लगाकर चैक किया कि कहीं सीसीटीवी तो नहीं लगा. जासूसी क्रियाओं को पूरा करने के बाद फिर बाद में पता चला कि भैय्ये इसे तो लक्ज़री कहते हैं. खुले आसमान के नीचे नंगे नहाओ. सब सेफ और मस्त.

नहाकर निकले तो भाड़े में एक स्कूटी ली. मस्त लाल रंग की थी. 


गोवा में स्कूटी चलाकर आपको आज़ादी महसूस होती है. हर तरफ़ से हवा आती है. अगर आप सिर्फ़ साइकिल की गद्दी जैसी फ्रेंची पहनकर भी स्कूटी चला रहे हैं तो कोई आपको घूरेगा नहीं.... सिवाय मेरे.

मतलब इतना लिबरल होकर भी क्या ही जीवन जीना. थोड़ा तो साला चारपाई वाली अंटियों जैसी हरकत करो तो संस्कृति बची रहती है. 

स्कूटी से सड़क किनारे-किनारे हम बीच घूमने निकल पड़े.  कई बीच घूमे. ऐसा ही एक बीच था- कोला. 

वहां गए तो देखा कई विदेशी कन्याएं समंदर में स्नान कर रही थीं. ये एक सुंदर दृश्य था. आज़ादी से भरा हुआ. वहां दिल्ली-नवेडा-हरियाणे टाइप जनता इस दृश्य को देखने की बजाय घूरकर और सेल्फियों में कैद करके कुछ अकुरवा तो रहे थे. पर ये विदेशी कन्याएं इतनी कॉन्फिडेंट और बेफिक्र थीं कि अचानक लगा कि मैं भी इतना कॉन्फिडेंट होता तो कॉलेज में प्लेसमेंट हो जाता.

बिकिनी पहनकर नहाती इन कन्याओं को देखकर मन हुआ कि जाएं ज़रा, हम भी नहाएँ. फिर ये ख़्याल मेरा स्वागत करता...इससे पहले ही अपनी स्वागत की सफेद बनियान चुभने लगी. लगा कि शायद मेरी ही तपस्या में कमी रह गई.

फ़िल्मों में ऐसे दृश्य देख चुकी आंखें पहली बार नंगी आंखों से ये पॉजिटिव 'नंगा नाच' देख रही थीं. तभी ध्यान आया कि हे पार्थ, तुम अकेले नहीं आए हो, जिसके साथ आए हो उस ओर गौर करो. वरना ज़िंदगी से मुहब्बत के 'गो, गोवा, गोन' होने में देर नहीं लगेगी.

चंद पल के मन की बेवफ़ाई के गिल्ट को दूर करने के लिए मैंने दिल बड़ा किया और अपनी कन्या से कहा- लो अब तुम स्कूटी चलाओ.

फिर मैंने पाया कि ये स्कूटी चल नहीं रही थी, हवा से बात कर रही थी. स्कूटी इतनी तेज़ चलाई जा रही थी कि लग रहा था कि इसी ट्रिप में पूरा दक्षिण भारत कवर किया जा सकता है. रास्ते में लड़कियां, लड़के बुलेट या स्कूटी से आते-जाते दिखे.  ये सब इतना सुंदर था कि लिखने बैठो तो उस मूमेंट को सही से बयां नहीं कर सकते. फिर ये सबक याद आता है कि हर सुंदर अनुभव लिखना ज़रूरी नहीं.

इसलिए पीले फूल बरसाते रास्तों पर स्कूटी चलती रही. चलती रही. चलती रही.  हमने गूगल मैप वाली औरत से कोई अनपेड वर्क नहीं करवाया.   जिस ओर का रास्ता सुंदर दिखा, उधर स्कूटी मोड़ ली. उत्तर भारत के शहरों में अगर आप घूमें तो आपको सड़क किनारे अक्सर बहते पेशाब की निशानियां या 'यहां ना मूत' वाली कविता कहानियां लिखी दिखती हैं.

गोवा में ऐसा नहीं दिखता है. हां सड़क किनारे आपको मूत जैसी शक्ल लिए पेट्रोल वाली बोतलें भरी रखी दिखती हैं. जो लगभग 120 रुपये में एक लीटर के भाव से हर कोने पर बिकती हैं. जिसकी स्कूटी रुके वो बोतल भरे और चला चले.

ऐसे ही एक रास्ते से जब हम Polem Beach जा रहे थे. तब रास्ते में एक फ़रिश्ता हमें दूसरी तरफ़ से इशारा करके कहता है- हेलमेट लगा लो.

हम रुककर हेलमेट लगाते हैं और आगे चलते हैं तो देखते हैं कि पुलिसवाले चैकिंग कर रहे हैं. एक ऐसे दौर में जब हर तरफ़ कुछ न कुछ कट रहा है, हमें चालान ना कटने की खुशी हुई. ठीक उसी पल मैंने ईसा मसीह की कसम खाई कि नेकी का दायरा और बढ़ाना है.

फिर कमस कम 30 स्कूटी वालों को मैंने सेम इशारा करके हेलमेट पहनवाया.

गोवा के रास्तों में तब आम के पेड़ों पर कच्ची आमी खूब लटक रही थीं. स्कूल में फिसड्डी मेरा दिमाग गोवा में आम के इतने सारे पेड़ देखकर कई बार सोचने लगा कि किसी पेड़ से पूछ बैठे- भैया यूपी में कौन ज़िले से हो?

पर मैंने अपना फोकस नहीं हटाया. जहां मौका पाया- कच्ची आमी तोड़ ली और ऐसे एक दो आमी नहीं तोड़ी... इतनी तोड़ी कि अगर गोवा में मौसी होतीं तो आम के आचार का धंधा सेट था.

आम यूं तो 'चुस्सड़' बनकर खाने में ही सुख है. पर चूंकि आपने शादी की है मिरांडा हाउस, जामिया से पढ़ी लिखी ज़िला टॉपर लड़की से तो यू शुड हैव सम एडीकेट्स.

ये लड़की आवन-जावन में कहीं भी स्कूटी रुकवाती. किसी घर के अंदर जाती और जाकर सीधा पूछती- डू यू हैव नाइफ? मैं जाता तो इस बात को यूं पूछता कि चक्कू है क्या?

गोवा निवासी अचानक आई लड़की के यूं चक्कू... आई मीन नाइफ मांगने पर पहले हैरत से देखते, फिर कच्ची अमियां देखकर समझ जाते कि ये मासूम हत्यारे नहीं, चटोरे हैं. 

अपने पूरे होश-हवाश में ये दावा करता हूं कि गोवा में स्कूटी चलाते हुए सड़क किनारे के कच्चे आम तोड़कर आपने अगर नहीं खाए तो समझिए कि आपने नहीं खाए... तो कोई बड़ी डील नहीं है. 

हर चीज़ का अपना सुख है. अपने भोगे सुखों और दुखों को किसी दूसरे पर नहीं थोपना चाहिए. सबके अपने अनुभव हैं. दूसरे के अनुभवों को जी सकते हैं पर जिया ही जाए, ये ज़रूरी नहीं. अपने अनुभव हमेशा अपने रहेंगे. पर हां, यार उधर से कभी जाना तो कच्चे आम खा लेना यार. कौन से तुम्हारे पैसे लगेंगे. वहां पेड़ से आमी तोड़ो तो यूपी वालों की तरह 'तोरी मैय्या के' कहते हुए कोई डंडा लेकर पीछे नहीं भागता.

मैय्या से याद आया कि गोवा में आप कहीं भा जाएं तो नारियल के अलावा आपको चर्च के चर्चे हर जगह मिल जाएंगे. लगभग हर चर्च पर Our Lady... टाइप कोई न कोई नाम होता है. शुरू में तो समझ ही नहीं आया कि अभी जिस Our lady में गए थे और अब जिस Our Lady में जा रहे हैं, दोनों में फ़र्क़ क्या है?


 

फिर लगा कि इमारत देखो, वाइब्स का आनंद लो. इतिहास का लोड क्यों लेना? जब लिखा ही दोबारा जा रहा है तो. एक बार फाइनल हो जाए, तब डिसाइड कर लेंगे कि विच लेडी इज Our Lady एंड विच लेडी इज Your Lady.

इतने चर्च घूमकर किसी 'Forwarded many times' वाले वॉट्सऐप मैसेज की तरह मुझे भी हिंदू धर्म ख़तरे में लगने लगा. तभी साउथ गोवा के Tambdi Surla, Chandor वाले महादेव मंदिर का पता चला. फ़व्वारे बनाम शिवलिंग के दौर में गोवा के ये प्राचीन मंदिर अपने भक्तों का इंतज़ार कर रहे हैं. 

पर भक्त समंदर किनारे बिकिनी पहने लड़कियों की साधना में लीन हैं और भांग से दूर बीयर ही बीयरमयी सीन हैं.

11वीं सदी से पहले बने इन मंदिरों में भी नंदी हैं. जिनके सामने न कोई मस्जिद है न ही बड़ी संख्या में कोई हर हर महादेव कहने वाले.

धर्म की ओर मुड़ा मन बोला- अरे बांगड़ू स्कूटी ढंग से चला ले. तो मैंने भी मन की सुनी.

ऐसे ही साउथ गोवा घूमत गए कई दिन बीत

मन बोला- नॉर्थ जाए बिन होए न प्रीत...

अगोंडा के जिस बीच पर रुके थे, वहां की मालकिन आंटी मस्त थीं. एकदम रॉ प्रॉपर्टी थी. ज़्यादा शू शा नहीं था. हमने कहा कि अच्छा चलते हैं, दुआओं में याद रखना...

तो वो आंटी बोलीं- उधर नहीं जाने का, उधर तुमको अच्छा नहीं लगेंगा, इधरईच रहने का न, वहां वेरी मच क्राउड...इधर कोई प्रॉब्लम है तो बोलने का न!

हमको लगा- ये तो मालकिन हैं इनका क्या है, हम घुमक्कड़ों का दायरा बड़ा है. इसलिए हमने सोचा कि अब बस्ते नॉर्थ गोवा में वहां रखे जाएं, जहां से सुबह उठकर ज़्यादा से ज़्यादा जगहें घूमी जा सकें.


ऐसी जगह थी- बागा और अंजुना बीच. हम इसके पास ही रुके. 

ये दो बीच ऐसे बीच हैं कि इनको बीच नहीं, चौराहा कहना चाहिए. यहां इतनी भीड़, इतना शोर है कि सुकून पसंद आपके मन को लगता है कि हमसे क्या भूल हुई, जो ये सज़ा हमको मिली. 

तेज़ आवाज़ में बजते वही दिल्ली-एनसीआर छाप गाने, हर जगह पड़ी बीयर की खाली, भरी और टूटी बोतलें, हुक्का पीते फोटो खिंचाते लोग और लोग ही लोग. हर तरफ़ से आती तेज़ चुभती लाइट और 'जीवन क्या है?' जैसे दार्शनिक सवाल की धज्जियां उड़ाते लोग. वहीं कहीं आकर पूछता कोई व्यक्ति- मांगता है क्या? 

पर इन सबसे आपने घबराना नहीं है. वहीं मिला एक भुट्टेवाला. आम के पेड़ से जो सवाल पूछना रह गया था, वो इससे पूछा. भैया कौन ज़िले से हो? यूपी के मिर्ज़ापुर से...

ये सुनते ही मैं जो अब तक मैं, मैं कर रहा था. भुट्टा सस्ता करवाने के लिए मैं से हम पर उतर आया. वहीं कहीं एक शिव मंदिर में स्थानीय उत्सव चल रहा था. लोग तेज़ ढोल बजाकर गुलाल उर्राकर नाच रहे थे. ये आवाज़ और डांस बागा के उस शोर, थिरकती बहकती टांगों से कहीं बेहतर थे. बोलो- हर हर महादेव.


अगली सुबह छह बजे हम नहाए धोए राजा बाबू, रानी बाबू की तरह नई भाड़े की स्कूटी पर लोड हो लिए. पणजी, ओल्ड गोवा और कुछ ख़ूबसूरत जगहें हमारा इंतज़ार कर रही थीं. ऐसे ही रास्ते पर पड़ता है- मंडोवी उर्फ़ अटल ब्रिज. खूब ऊंचा है. 

स्कूटी लेकर इस ब्रिज पर चढ़े ही थे कि एक फरिश्ता फिर आया और बोला- आगे नहीं जाने का इधर से, फाइन कटेगा. मैंने वजह पूछी तो पता चला कि तुम स्कूटी लेकर जाएगा तो हवा इतनी ज़ोर का चलता है कि तुम उड़ जाएगा. 

इस एक मूमेंट पर मैं अपने फ़ौलादी जिस्म से कुछ कसक बाक़ी रह गए बदन पर ग़ौर करने ही जा रहा था कि उस बोर्ड पर नज़र गई, जो सभी टू-व्हीलर के साथ सेम टू सेम पक्षपात कर रहा था. दूसरे के साथ हुई नाइंसाफ़ी तब तक समझ नहीं आती, जब तक ख़ुद के साथ नाइंसाफ़ी ना हो जाए. 

लिहाज़ा हमने गड्डी पीछे मोड़ी और दूजे पुल से पणजी चले गए. पणजी के बीच, किले और पुराने घर देखे. फिर फ्री की फेरी में स्कूटी चढ़ाकर ओल्ड गोवा गए. 

एक सुंदर से टापू गए, जहां शायद कम लोग ही जाते हैं क्योंकि वहां की सड़कों पर सिर्फ़ एक स्कूटी दौड़ रही थी. साड्डी स्कूटी.

पुर्तगाली कॉलोनी और पुराने घर बेहद सुंदर थे. लगा कि किसी घर के अंदर जाना चाहिए. हम एक घर के बाहर रुके. घर के चबूतरे जैसी जगह पर एक अम्मा प्राचीन कुर्सी पर बैठी थीं. हमने पानी मांगा. वो लेकर आईं, उनके घर की थोड़ी सी झलक दिखी. लगा कि शायद वो हमारी मम्मी लोगों की तरह घर बुलाकर और स्वागत सत्कार करेंगी, इसी बहाने थोड़ा और घर दिख जाएगा.

भैय्ये भलाई का जमाना नहीं रहा.  'सावधान इंडिया' देख चुकी उन अम्मा को लगा होगा कि ये बंटी बबली टाइप जोड़ा है जो अंदर आकर सब लूट लेगा. पानी की प्यास तो बुझी लेकिन वो घर अंदर से नहीं देख पाए.


लेकिन प्रभु यीशु की कृपा और स्कूटी में भरे पेट्रोल की कृपा से कई सुंदर पुराने घर देखने को मिल गए. 

कई घरों में बस ताला लगा हुआ था. इनके मालिक शायद कहीं बाहर बस गए हैं. यहां बचे हैं तो बस घर और इन घरों को बाहर से देखने आने वालों का यहां घर बसाने का अधूरा मन. ये मन फेरी से नदी पार करते हुए डीजल की दुर्गंध के साथ गड्डमड्ड हो जाते हैं. 

पणजी समेत फ़िल्मों की शूटिंग के कारण और मशहूर हो चुके किले गोवा को 'टूरिस्टों का गोवा' बनाते हैं. जहां 'दिल चाहता है' जैसी फिल्मों के दृश्यों वाली जगहों पर खड़ी सैकड़ों की भीड़ अपना-अपना 'दिल चाहता है' मूमेंट रच रही होती है.

दूर खड़ा मन सवाल करता है कि इतने सारे 'चाहते दिलों' के बोझ से दबे इस किले के लिए ख़ुद पर आख़िरी आक्रमण कौन सा रहा होगा? या अब इन वीरान खंडहरों, लाइटहाउसों पर आते मुस्कुराते लोगों का 'लव यू ज़िंदगी' ही इनकी ज़िंदगी बन चुकी है.

जवाब पता नहीं. पता है तो ये कि अब तेरे भाई को एक्सट्रीम नॉर्थ गोवा जाना मांगता है.

गोवा के महाराष्ट्र बॉर्डर की तरफ बढ़ने पर कई प्यारे, शानदार बीच हैं. ये बीच इतने सुंदर और सुकून से भरे हैं कि लगता है टाइम, स्पेस के क़ाग़ज़ को किसी ने मोड़कर नॉर्थ और साउथ को जोड़ दिया है. बीच का जो सब शोर-शराबा, बीयर मन खराबा कहीं फ़रार हो गया है.


नॉर्थ गोवा के इस हिस्से में रूसी लोग अच्छे खासे पाए जाते हैं. मन तो किया कि सवाल करूं कि अबे ये बताओ तुम लोगों को पुतिन में ऐसा क्या दिखता है बे? फिर लगा- छड्डो यार, पलटकर वो भी कुछ ऐसा पूछ बैठा तो मैं क्या शक्ल लेकर दिल्ली लौटूंगा.

ये वो वक़्त था जब कितने ही यूक्रेन और रूस के टूरिस्ट गोवा के इस हिस्से में रह रहे थे या फँसे हुए थे. दूर देश में रहकर अपने देश में मचती तबाही के बारे में सुनना या देखना कैसा लगता होगा? जवाब नहीं मालूम. शायद नमकीन आंसू जैसे पानी वाले समंदर को मालूम हो.

हमको जो मालूम था वो ये कि ज़िंदगी में View अच्छा होना चाहिए. चाहे दिमाग के अंदर वाला हो, चाहे आंखों के सामने वाला हो. 

इसीलिए इस बार भी जिस बीच पर रिजॉर्ट रूम लिया, वो भी समंदर के ठीक सामने वाला था. खिड़की से समंदर दिखता. पैदल नंगे पैर चले जाओ तो पहले खूब फूल वाले पेड़ आते. फिर बुक की अलमारी के रास्ते कैंटीन से होते हुए सीधा रेत. कुछ बने, बिगड़े रेत के घर. 


कुछ लिखे नाम, अपनों के या उन परायों के जो आज भी उतने ही अपने हैं, जितने पहले थे. बस दोनों को ये पता नहीं.

इस रिजॉर्ट की कैंटीन में बुक सेल्फ थी.जितनी किताबें पढ़नी चाहिए, उससे कोसों दूर हूँ. 

पर किसी के भी घर जाऊँ तो सब छोड़ मन करता है कि सारी किताबें देखूँ, नाम पढ़ूँ. पन्नों की ख़ुशबू सूंघ लूं. किसी भी जगह की सबसे सुंदर चीज़ वहाँ रखी किताबें लगती हैं.

रेस्त्रां में किताबों की एक बड़ी बुक सेल्फ़ थी. जिसमें रखी किताबें धूल खा रही थीं. बुक भी अच्छे से नहीं रखी थीं. धूल की परत बता रही थीं कि कब से इस प्यासी ज़मीन पर प्यार की एक बूँद तक नहीं गिरी.

वो भी तब जब किताबों के ठीक सामने विशाल समंदर हो. तो स्मूदी जब तक स्मूदिया रही थी, मैं गया और सेल्फ़ को कपड़े से साफ़ करने लग गया. सारी किताबें पोंछी. साइज़ के हिसाब से सेटकिया और कुछ को मिजाज़ के हिसाब से.


होटल वाले ‘अरे सर, अरे सर…’ की औपचारिकता में लगे थे पर अब तक अपने अंदर प्रकाशक की आत्मा आ चुकी थी. किताब बिके ना बिके, विमोचन का फ़ीता ऐसा लगाना है कि काटने वाले को भी लगे कि क्या कटा है!

तभी इंग्लिश बोलती हुईं ये माता जी आईं. कुछ इंग्लिश में बोलीं. मुझे लगा किताबों की धूल कान में घुस गई. सब्जेक्ट कुछ महसूस नहीं कर सकता.

पर स्माइल दे सकता है. तो मैंने बिंदास मुस्कान दी. फिर याद आया कि मैं तो अंग्रेजों की खाता हूँ तो मैंने भी गला गीला किया और फिर मैंने भी इंग्लिश में दो चार Present continuous tense दिए.

माता जी ईरान से हैं. स्कूल प्रिंसिपल रह चुकी हैं. बेटे बहू के साथ गोवा आईं हैं.  हाथ में किताब हमेशा रखती हैं. नाम है- Nevina. सोशल मीडिया सख़्त नापसंद. 

मुझे अलमारी साफ़ करते हुए देखकर बहुत खुश हुईं. गले भी लगीं. तारीफ़ में कुछ कुछ बोलीं. जो इंग्लिश में होने की वजह से और सुंदर लग रही थी. ईरान से लाई एक डायरी भी गिफ़्ट की एक प्यारे से मैसेज के साथ, जिसकी एक लाइन ज़िंदगी भर साथ रहेगी- Tolerance is the Sweetest Gift.

उनसे मुलाक़ात इतने कम पल की रही कि ये कसक आज भी ताज़ा हो गई है. उनकी याददाश्त इतनी अच्छी कि जब मैं साउथ के कुछ बढ़िया कैफे और होटल्स के नाम उन्हें बता रहा था तो उनका बेटा बोला कि लिखे कहां? वो बोलीं- तुम बोलते जाओ, मुझे याद रहेगा.

पता नहीं जगहों के साथ, उन जगहों को बताने वाला ये अदना सा बंदा याद होगा या नहीं. कितने सारे मौक़ों पर मैंने पुख़्ता जवाब मिल सकने वाले सवाल नहीं पूछे, क्योंकि डर था कि कहीं मेरा भरम ना टूट जाए. इसका फ़ायदा जिन-जिन लोगों ने उठाया...सबको प्यार. सबकी यात्राएं सुंदर हों.

दिल्ली लौटने की फ्लाइट में खिड़की वाली सीट नहीं मिली. मन दुखी था. लास्ट में सीट मिली. फिर बगल में 'खिड़की' किनारे बैठे आदमी का दर्द सुना. उसने बताया कि 200-300 रुपये देकर विंडो सीट ली थी और जिस सीट पर बैठा वहां विंडो ही नहीं.

अपना दुख कम हो गया. ज़ोर-ज़ोर से ठहाके लगाते मन ने ये पूछना चाहा कि और भैय्ये विंडो सीट से सही View आ रहा है? पर इस सवाल और इस अपने व्यू से ज़्यादा मुझे कुछ घंटों पहले जिया View याद आने लगा.

जिन दिनों गोवा गए, वो गर्मी भरे दिन थे. पर मुझे यक़ीन था कि पानी सिर्फ़ ज़मीन से हमारा स्वागत नहीं करेगा. आसमां भी करेगा. 

गोवा की आख़िरी शाम में जब हम घंटों मोमबत्ती जलाए समंदर किनारे बैठे हुए थे. तब बादल गरजे. बारिश हुई. बड़की छतरी के नीचे विराजमन होकर बिना देरी किए मैंने जगजीत सिंह जी के गाने धीमी आंच में चला दिए. संगीतकार समंदर भी एक्टिव हुआ और लहरों की धुन से अपने जग्गी से सुर मिलाने लग गया.

''ठुकराओ.. अब के प्यार करो... मैं नशे में हूँ 

जो चाहो मेरे यार करो मैं नशे में हूँ''

गोवा का नशा चढ़ाने के लिए शराब या बीयर नहीं लगती. जो लगता है वो वहां जाकर ही महसूस किया जा सकता है. ये अनुभव इतना सुंदर होता है कि महीनों बीत जाने के बाद भी जब गोवा याद आता है तो मन ख़ुद से कहता है- यादों में गिरने दो तुम मुझे, मेरा गोवा वाला सागर संभाल लो...मैं नशे में हूं!

टिप्पणियाँ

  1. अच्छा लगा पढ़कर ❤️🌼

    जवाब देंहटाएं
  2. लव यू सर् 💙, आपके अनुभव मेरे एकांत को ऊर्जा से भर देती है। फ़िलहाल मेरे पास भ्रमण का एक मात्र सहारा है भ्रमण पर लिखे को पढ़ना। मुझे इसमें बहुत आनंद भी आता है। मैं इसे इस तरह पढ़ता हूँ जैसे पहली बार मेरी प्रेमिका ने मुझे चिट्टी लिखा हो। आपसे और उससे भी ज़्यादा आपके लिखे से मुझे मोहब्बत है, ये मेरा आपके लिखे पर प्यार का इज़हार है। थैंक्यू सर् 💙

    जवाब देंहटाएं
  3. इस गोवा यात्रा का जायका बेहतरीन था, स्वादिष्ट था, और लाजवाब था. और हाँ बीच-बीच में जो ( हाय कितने दिन बीते... तुम घर ना आए' से लेकर 'ठुकराओ.. अब के प्यार करो... मैं नशे में हूँ.' जैसी) फुलझड़ियाँ-सी जलाई गईं उससे तो और भी आनंद आ गया. यानि इनसे इस पोस्ट पर चार चाँद लग गए.
    और हाँ फॉण्ट वाली बात पर जरुर ध्यान दीजिएगा.

    जवाब देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें