'जलती लाश से निकल रही बदबू नहीं बन पाया'

मैं बहुत ज्यादा हूं. होते हैं न कुछ लोग. सब जगह घुस जाते हैं. जबरन या कब्जे वाला घुसना नहीं. बस घुस जाने वाला. शायद घुसपैठिया सही मैटाफर है. घुसपैठिया भी नहीं, मैं मैटाफर हूं शायद. दो चीजों को जोड़ने, बाहर सब कुछ हो रहे को भीतर एक्सप्लेन करने के काम आता हूं. खुद अकेला बचके किसी काम का नहीं रहता. बहुत ज्यादा सोचने.. चीजों.. काम.. आॅब्जर्वेशन में घुसे रहने वाला मैटाफर. जिसकी अपनी सारी खुशियां दूसरों पर बेस्ड होती हैं. पर पूरे लालच के साथ. खुद का खुशी वाला काॅलम भर जाना चाहिए. इत्ता फरेब करता ही हूं!

कई बार इतना ज्यादा हूं कि मेरे साथ रहने से आसान...मुझे मेरे हाल पर छोड़के चले जाना है. छोटी छोटी बातें बुरी लगती हैं. बड़ी बड़ी बातें कुछ नहीं लगती. लगे भी क्यों, बातों का मजा छोटी होने पर ही तो है. माथे से निकली पसीने की गीली भरी सी लकीर दुनिया को तो दिखती है.

पर हमें महसूस तो वो वाली पसीने की बूंदे होती हैं न, जो आधी कमर के नीचे खाल और टीशर्ट की छोटी से दूरी में शुरू होकर वहीं कहीं खत्म हो जाती हैं.

नदी किनारे जलती लाश की आग पानी में दिखती है, तब भी तो वो चिता ही रहती है. उस पानी में आग के दिख जाने से या अपनों के आंखों में पानी आ जाने से जलती लाश की बदबू को क्या ही फर्क पड़ता है. मैं कभी चिता की वो बदबू नहीं पाया, जिसे कोई फर्क नहीं पड़ता. मुझे हर बात पर फर्क पड़ा. वो जब जब किसी को मेरे लिए साॅरी फील हुआ या उनके कुछ कहने पर मैंने कहा, 'लोड मत लो, सब ठीक है.' माफ करना पर बहुत फर्क पड़ा. मैंने सबको तनिक भर कह देने से ही गले लगाया है. कहा न, छोटी छोटी बातें अक्सर बहुत बड़ी बातें होती हैं!
हर बात से खुद में कुछ फर्क न पड़ा.. तो ये कैसी बात है जो हम खुद के आस-पास समेटे हुए हैं. और क्यों ही. दूर जाने से डरना क्यों. गले मिलते वक्त छातियो से ज्यादा भीतरी गला मिल रहा होता है. हल्का सा खुशी या दुख वाला पानी आ जाता है.

किसी को कुछ बुरा न लग जाए, इसकी वजह से खुद को बहुत बुरा लगे जा रहा हूं.

अब इसे खत्म कर देते हैं. अच्छा हां, यहां जो मैं है वो कोई और है. जहां रहता हूं, वहां जो है वो कोई और है. मुझमें जो है, वो भी कोई और है. और भी कोई और है.

टिप्पणियाँ

  1. अव्वल तो बहुत दिन बाद तुम्हें पढ़कर ही अच्छा लग रहा है। बाकी जो कहा है वो हमेशा की तरह दिल से कहा सा है तो आत्मीय सा महसूस हुआ। लिखते रहो भाई

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