अन-अल-हक... अहं ब्रह्मास्मि

भाषाएं कितनी जादुई हैं. फिर चाहे वो भाषा, जिसकी गुल्लक प्रेमिकाओं की आंखों में होती है. या वो भाषा, जिसे कहने या न कहने पर कितना कुछ बदल जाता है. सही टाइम, स्पेस के साथ समझ आ जाए तो कितना कुछ बदल जाता है. कई भाषाओं को जानने वाले लोगों के लिए मेरे दिल में अलग ही इज़्ज़त रहती है. ये लोग मुझ जैसे सिर्फ़ हिंदी की पतवार के सहारे नाव चलाने वाले नहीं होते हैं.

ये उन लोगों जैसे भी नहीं होते हैं, जो 'अन-अल-हक़' सुनते ही भड़क जाते हैं. जबकि अब इनके दुश्मन हो चुके अनुराग कश्यप ने 'सेक्रेड गेम्स' में जब 'अहं ब्रह्मास्मि' बुलवाया था तो ये सारे अपने गर्व से भरे सीनों को 'अहं ब्रह्मास्मि' छपी टीशर्ट से ढक लेते हैं.

गणेश गायतोंडे की तरह ख़ुद को 'मैं ही ब्रह्मा हूं...' पुकारने लगते हैं.  जबकि बात तो एक ही थी. अन-अल-हक... अहं ब्रह्मास्मि.



लेकिन हमें भाषाएं नहीं आती हैं. एक भाषा ज़रूर सीख ली है. धर्म की भाषा. जिसका जमकर इस्तेमाल मुसलमानों के भी एक वर्ग ने किया और हिंदुओं का एक वर्ग भी कर लेना चाहता है.

जब तुम सब अपने-अपने माइकों से अल्लाह और राम पर ज़ोर देते हो तो कितनी ही बुदबुदाती दुआएं या तो चुप हो जाती हैं. या माइक के शोर में शामिल हो जाती हैं. एक कम्युनिस्ट ने जब ये लिखा कि नाम रहेगा सिर्फ़ अल्लाह का.. तो वो उस अल्लाह की बात नहीं कर रहा था, जिसका नाम लेकर गर्दन काटते आतंकियों का ख़ौफ़ तुम्हारे अंदर है और मेरे अंदर भी है.

दोनों के शब्द एक सुनाई पड़ सकते हैं लेकिन 'भाषा' अलग है.

कितनी ही बार ये सच सुना और महसूस किया है कि दुनिया की सारी कहानियां एक ही हैं. तमाशा फ़िल्म का वो कहानीकार बुड्ढा भी तो पागल होने से पहले कहता है, 'यमुना है या जमुना. जोसेफ है या ईसा. मोसेस है या मूसा. बताओ. ब्रह्मा है या अब्राह्म या इब्राहिम. सिंधु नदी या इंडस. हिंद है या इंडिया....'  'तो क्या तकलीफ है. अरे कहानी कहानी होती है और वो ही कहानी हर जगह चलती है. हर वक़्त. अयोध्या में. यूनान में. लैला-मजनू. रोमियो जूलियट. सिकंदर की चढ़ाई. लंका की  लड़ाई. और इस वक़्त हमारे आस-पास. और तुम्हारी ज़िंदगी. अरे वही कहानी...एक ही. सोचो मत कि क्या कहां कब और किसकी. बस मज़ा लो कहानी का....''

तो क्या हुआ जो नाम मेरे फेवरेट महादेव या बजरंग बली का रहे या किसी असगर के अल्लाह का.

ख़्याल बस ये रखना है कि जो मुहब्बत गायब रहे वो हाज़िर हो जाए.

ताकि वो दिन के जिसका वादा है वो हम देखेंगे नहीं... महसूस करेंगे. अपनी-अपनी भाषाओं के साथ...अलग सी सुनाई पड़ने वाली लेकिन एक ही बात को कहते हुए. क्योंकि...

मैं जो मैं भी हूं
वो तुम भी हो...

टिप्पणियाँ