होप यू आर वेल...

 विनोद कुमार शुक्ल ने मुक्तिबोध को एक चिट्ठी लिखी थी. 

''कविताएं लिख रहा हूं, कहानियां लिख रहा हूं, उपन्यास लिख रहा हूं- आपने मुझमें इतना विश्वास भर दिया है कि ग़लत नहीं लिखूंगा, बहुत लिखूंगा. अच्छे से अच्छा लिखूंगा...''

कई साल से ये चिट्ठी वॉट्सऐप का वॉलपेपर है. 

रोज़ किसी को कुछ भी लिख रहा होता हूं तो ये दिख रहा होता है. फिर लगता है कि लिखने के नाम पर क्या ही लिख रहा हूं. कुछ एक्सेल शीट्स के खांचे भरना, कुछ 'होप यू आर वेल' जैसी मेल लिखना, कुछ इधर उधर बेनाम का लिखना...

सब लिख रहा हूं. कविताएं, कहानियां, रिपोर्ट्स और यक़ीनन उपन्यास तो नहीं ही लिख रहा हूं. 

बीते कुछ सालों ने मुझमें इतना विश्वास भर दिया है कि न ग़लत लिख रहा हूं, न सही लिख रहा हूं, न दिख रहा हूं और ज़ाहिर है न बिक रहा हूं...

इस बीच कुछ के सवाल सीने पर आकर लगे कि कुछ लिखते क्यों नहीं, अब तुम दिखते क्यों नहीं? 

कई बार दो में से एक सवाल का जवाब मालूम ना हो तो दूसरे का जवाब भी नहीं दिया जाता.

विनोद कुमार शुक्ल पर तब से डॉक्यूमेंट्री करने का मन था, जब Mubi वाली 'चार फूल हैं और दुनिया है' शूट भी नहीं हुई होगी. इस बीच जब कोशिशें तेज़ हुईं तो विनोद जी की तबीयत धीमी हो गई.  जब लगा कि शायद देर सवेर कुछ बात बने तो देर हो गई. 

खिड़की बंद हो गई. ख़्वाहिशों की दीवार ढह गई. नौकर कमीज़ पहनकर गले मिल सकने की अधूरी इच्छा लिए कारखाने लौट गया.

मुक्तिबोध की एक कविता है- 

''विचार आते हैं

लिखते समय नहीं,

बोझ ढोते वक़्त पीठ पर

सिर पर उठाते समय भार

परिश्रम करते समय''



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