खुला खत: चाचा चौधरी के प्राण जल्दी आइएगा अपने तेज दिमाग के साथ

स्कूल की किताबें पढ़ना किसे अच्छा लगता है. पर उन किताबों के बीच अगर चाचा चौधरी की कॉमिक्स हो तो टीचर की नजर में पढ़ाकू बनने का अच्छा मौका रहता था. चाचा चौधरी, बिल्लू, पिंकी और साबू को प्राण बख्शने वाले प्राण कुमार शर्मा, आज आप दुनिया के शोर में खामोश हो गए हैं, तो बचपन की तमाम यादें आंखों के सामने आ रही हैं.

बचपन की नादानियों में समझदारी की खिड़की लगाने वाले प्राण साहब आपने बहुत छोटी उम्र में ही नैतिक शिक्षा का जो पाठ हंसते-खेलते हुए पढ़ाया. वो पाठ सिर्फ आप और आपकी आड़ में आपके किरदार ही पढ़ा सकते थे. चाचा चौधरी जिनका दिमाग कम्प्यूटर से भी तेज चलता था. कितना जीवंत किरदार आपने गढ़ दिया था प्राण साहब. जिस उम्र में हमारे चेहरे से बचपन की मासूमियत टपक रही थी, आपकी मजबूत किरदार रचना की वजह से हम भी खुद को 70 साल का बिना मूंछों वाला चाचा चौधरी समझने लगे थे. उनको पढ़ते-पढ़ते हमें भी लगने लगा था कि अगर दिमाग तेज चलाना है तो चाचा चौधरी को पढ़ना चाहिए. साइकिल पंचर हो जाने पर स्कूल से घर तक कैसे जाना है, तब हम आसमान में चाचा के स्टाइल में सोचने का दिखावा ऐसे करते थे जैसे हमारा दिमाग भी कम्प्यूटर से तेज ही चलता हो. हम बच्चे थे न प्राण साब, इसीलिए आपकी दुनिया में खोते जा रहे थे.



सेहत में हम लोग कुरकुरे, lays के पैकेट जैसे थे. हल्के से जिसमें बाहर से तो बहुत कुछ दिखता तो है पर अंदर कुछ नहीं होता है. स्मालपन के दिनों में जब किसी से लड़ाई होती थी, तो हम आपके उस जुपिटर प्लैनेट से आए गबरू, जवान, पहलवान साबू को याद कर लेते थे. साबू के डोले याद करके हम कूद जाते थे लड़ाई के मैदान में. हालांकि हड्डियों में गूदा कम होने की वजह से ज्यादातर हारे ही हैं. पर हमेशा यह सोचकर खुद को संतोष दे देते थे कि कोई नहीं, बड़े होने पर हमारे पास भी अपना 15 फुट का साबू होगा, तब देख लेंगे इस जालिम दुनिया को.

प्राण साहब, चाचा-चाची (बिन्नी) की नोंक झोंक में हम अपने दादा-दादी के प्यार को खोजने लगे थे. सबसे मजेदार तो चाचा का वो राका डाकू को हर बार हराना और उसकी मूंछे मुंडवा देना था. प्राण साहब, अच्छा था जो उस उम्र में किसी दोस्त की मूंछे नहीं थी वरना राका चाचा की टक्कर को देखते हुए हम भी अपने दोस्त को हराने पर उसकी मूंछे मुंडवा देते. प्राण साहब आपके कॉमिक कैरेक्टर्स के नाम गोबर सिंह, धमाका सिंह, राका, पिंकी ऐसे थे जो बच्चों की जुबान में आसानी से चढ़ जाते थे. सुपरमैन, फैंटम और तमाम पराए जैसे नामों वाले कैरेक्टर्स के बीच आपने हमें हमारे अगल-बगल के कैरेक्टर्स से रू-ब-रू करवाया.



बिल्लू, जिसके बड़े बालों की वजह से उसकी आंखें नहीं दिखती थीं. सब लड़कियां उस पर जान छिड़कती थीं. हमें भी लगा कि शायद ऐसा बाल बढ़ाने की वजह से हो रहा है. पर आप तो समझ ही रहे होंगे न वर्चुएल वर्ल्ड की टीचर्स की तरह इस रियल वर्ल्ड के टीचर्स बड़े दिलवाले नहीं थे तो किसी ने हमारे बालों के आंखों तक आने का इंतजार ही नहीं किया. हमारे बाल तो कटवा दिए गए, पर बिल्लू की तरह हमने भी अपना हंसी-मजाक और 14 साल से कम की उम्र में हीरो बनने की कोशिशों को नहीं छोड़ा.

प्राण साहब, आपकी कॉमिक्स का हमारी मम्मी ने भी खूब सहारा लिया. जिस उम्र में दूध पीना नहीं पसंद था. उस उम्र में चाचा जैसे दिमाग और साबू जैसी बॉडी के लिए हमने अंगूर को छोड़कर भारी-भरकम तरबूज अपने नन्हें हाथों में ले लिया. उफ्फ मम्मी की वो बातें आज भी याद हैं हमें कि ओ छोटे चाचा चौधरी कुछ खाते जा.

प्राण साहब, आपने कॉमिक कैरेक्टर्स में अपने ह्यूमर से जो जान फूंकी थी. वो हमें आज भी याद है. आज जब आपका करिश्माई दिमाग शांत हो गया है तो हमें वो आपके सारे कॉमिक किरदार याद आ रहे हैं जिन्होंने आज इस अधेड़ सी उम्र में पहुंचने के बाद चाचा चौधरी, बिल्लू, पिंकी, साबू को हमारे सामने ऐसी डाइमेंशन में ला खड़ा कर दिया गया था जिसके लिए कोई टू, थ्री, फाइव डी की जरूरत नहीं है. सच कहा जाता है कि आप भारत के वॉल्ट डिजनी हैं. जिसकी बराबरी आज या भविष्य में शायद ही कोई कर पाए. क्योंकि जब प्राण नहीं रहते तो जिंदगी के किरदार चुप हो जाते हैं.

प्राण साहब, जल्दी लौटिएगा. किसी नए किरदार में अपने उसी कॉमिक्स के करिश्माई अंदाज में. ताकि आने वाली नस्लें कार्टून देखकर कार्टून जैसे न बनें. कुछ सीखे भी जिस तरह हम जैसे लोगों ने सीखा था आपके कॉमिक किरदारों के जरिए.

अलविदा प्राण साहब. जल्दी आइएगा....

6 अगस्त को प्राण साहब के न रहने पर लिखा







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