लड़कों को रोना मना था...


लड़कों को रोना मना था. वो सालों साल किसी से नहीं कह पाए कि उनके कंधों पर इल्ज़ाम की एक बोरी लदी है. जिनमें एक बड़ा हिस्सा इल्ज़ाम नहीं, कबूलनामा था.

इन लड़कों ने ज़िंदगी में प्रेम तो कई बार किया लेकिन हर बार वो यही सुनते आए कि ‘प्रेम निभाना लड़कियों से सीखो.’ लड़के आंखों के सामने प्रेमिकाओं की शादी देखकर भी प्रेम निभाना नहीं सीख पाए. ये लड़के मन और शरीर की इच्छाओं को साथ लेकर चलते थे. चूमना, गले लगाना और सो जाना.  कुछ लड़कों को पसंद तो था. लेकिन सिर्फ इतना भर ही. शादी का नाम सुनकर वो प्यार ख़त्म होने के डर से भर जाते. कुछ रिश्ते फौरन मर जाते. जो बचे रहते,  वो बचाए रखते. इन लड़कों के सबसे अच्छे रिश्तों की उम्र सबसे कम रही. लंबे रिश्तों में रहते हुए वो अक्सर ये बात सोचा करते.


फिर कहीं से  कोई लड़की आती और उन्हें गले लगा लेती. लड़के मन और शरीर की इच्छाओं को साथ लेकर चलते थे. लड़के इस बात से वाकिफ थे कि समाज उन्हें कुछ कहेगा नहीं. इस मौन स्वीकृति का लड़कों ने फायदा भी उठाया. लेकिन शराब के नशे, पहाड़, समंदर और बर्फ में वो लगभग फूटकर रोए हैं कि कुछ फायदे उन्हें ज़िंदगी भर चुभेंगे. इन कुछ लड़कों की नियत भी शायद ख़राब नहीं थी. बस वो अपनी ही कई प्रेम कहानियों को बुन रहे थे. लेकिन यहां भी घरों की वो परछाई बड़ी होकर आ खड़ी होती, जहां बुनने का काम औरतें करती और उधेड़ने का आदमी. ये लड़के रातों के सुखों की अगली सुबह प्रेमिकाओं के माथे तो चूमते थे लेकिन आईने में कुल्ला करते हुए खुद से सवाल करते थे- मैंने कोई फ़ायदा उठाया या सिर्फ़ प्रेम का एक पैराग्राफ पूरा किया.



इन लड़कों की उंगलियों की स्याही कभी सूखती नहीं थी. लड़कियों की पीठ पर लिखते हुए कई बार वो परेशान रहते कि उंगलियां जो लिख रही हैं,  मन भी वही लिख रहा है क्या? लड़के शरीर और मन की इच्छाएं साथ लेकर चलते थे. ये वही लड़के थे, जिनकी मांएं अपने पतियों से पिटने के बाद अक्सर ये कहा करती थीं कि अपने बेटे की शक्ल देखकर ज़िंदा हूं एक बार ये बड़ा हो जाए. मांओं और लड़कों ने कभी सवाल नहीं किया कि बड़ा होकर ये भी एक पति या आदमी बन जाएगा, लड़का नहीं रहेगा. इन्हीं लड़कों को कई बार ये डर रहा कि साथ चलते हुए या अकेले में कोई इनकी बहन या प्रेमिकाओं को न छेड़े. बलात्कार तो बिलकुल न करे. यही लड़के थे जो इस डर को उन पलों में भूल गए, जब वो किसी लड़की को प्रेम की बुनी शॉल ओढ़ाकर बेतहाशा चूम रहे थे और लड़की गर्दन से नीचे नहीं आने देने की कोशिश करते हुए हार मान बैठी थी.


पिता की मार और बोझ से पड़े अपने शरीर के निशान इन लड़कों ने कभी आईने में नहीं देखे थे. ये निशान इन लड़कों ने लड़कियों के बदन पर बनाकर देखे थे. लड़कों को नीला निशान सुंदर लगने लगा था. नीले निशान वाली लड़कियां गुस्से में हंसती हैं तो खूबसूरत ग्लेशियर लगती हैं.

थे ऐसे भी बहुत से लड़के जो घर लौटना चाहते थे लेकिन वो लड़के थे और शहर में रहना उनकी मजबूरी...इसलिए वो कभी लौटे नहीं. शहरों की रातों में पैंट में हाथ डाले डाले सो गए. इन्हीं में से कुछ लड़के ये करते हुए बाहर सड़कों तक आ गए थे. अपने दर्द को किसी और की आंखों में देखने का सुख देखने के लिए. इससे ज़्यादा उनका इरादा न था और जिनका था- वो उन लड़कों के डर की वजह बन गए, जिनकी आंखों में बहन और प्रेमिकाओं को छेड़े जाने का डर रहता था. लड़कों को कभी मांओं के छेड़े जाने का डर नहीं सताया. क्योंकि इन्हीं लड़कों को भी अधेड़ औरतों को छेड़ने का मन नहीं हुआ. लड़कों ने सोचा होगा कि जैसा मेरा लटकी खाल देखकर कुछ मन नहीं हुआ, वैसे बलात्कारियों का भी मन नहीं होता होगा. ये लड़के मासूम थे.


कुछ लड़के ऐसे भी हो गए कि एक साथ कई प्रेम संबंधों में रहे. इन संबंधों के आगे प्रेम लड़कों ने ही लगाया था. कुछ लड़के इसे 'कइयों की ले रहा'  भी कहते थे. लेकिन यही वो लड़के थे, जो जब एक के साथ रहते तो एक ही के साथ रहते.  उस रहने में जीभर प्यार करना रहता,  शरीर और मन दोनों का. उस पल सिर्फ एक ही संबंध रहता, जिसके आगे प्रेम हो.. ये ज़रूरी तो नहीं. हां लेकिन शरीर और मन ज़रूर रहता था.

कुछ लड़कों को प्रेमिकाओं और घर की ज़िम्मेदारियां खा गईं. लटकने से ठीक पहले उनकी आंखों के सामने जो चेहरा रहा होगा,  उतनी सुंदर तो कोई प्रेमिका तब भी नहीं लगी होगी, जब गोल्डन फेशियल वाला कोई मेकअप घंटों की मेहनत के बाद ब्यूटी पार्लर वाली ने किया होगा. ये कहते हुए कि ‘दूल्हे से रुका ही नहीं जाएगा दीदी.’

किसी ब्यूटी पार्लर वाली ने कभी नहीं कहा होगा- तुम्हें देखकर प्रेमी लड़के से रुका नहीं जाएगा. लड़कों को पति के रूप में तो सबने स्वीकार किया लेकिन प्रेमी के रूप में... बहुत कम ने. ये लड़के प्रेम के रिवीज़न में यकीन रखते थे. ये कहते हुए वो ये बात जानते थे कि प्यार तो सिर्फ एक बार होता है. लेकिन फिर जो अभी हुआ वो क्या है? लड़के शरीर और मन की इच्छाओं को साथ लेकर चलते थे. लेकिन इस बात से वो भी अंजान थे.

ये वही लड़के थे, जो बाप की रिटायरमेंट पर ये देखकर रो पड़े कि कंपनी का बॉस विदाई समारोह में ‘दो शब्द’ बोलने से पहले चार शब्द ये पूछ बैठा कि ‘आपका नाम क्या है?’
लड़के के बाप का नाम उस कंपनी को नहीं पता चला, जहां से 30 साल उसका बाप रोज घर लौटता और मां को पीटता था. इन्हीं लड़कों का मन किया कि अपने बाप के बॉस की छाती पर लाते ही लाते मारकर बोलें कि मेरे बाप का नाम ये है और ऐसे ही उसने हर रोज तुम्हारी कंपनी से लौटकर मेरी मां को लात मारी थी. लड़के चुप रहे. वो शरीर और मन की इच्छाओं को साथ लेकर चलते थे.


वो भी लड़के थे जो अब आदमी बन चुके थे और अच्छी कमाई कर रहे थे. सुंदर लड़कियों को पास आते देखकर सोचते कि ये मेरे पास आ रही है या कमाई के पास. फिर उन्हें अपनी कोई प्रेमिका याद आ जाती. जो जाते हुए ये कहकर गई होगी कि पता है जिससे शादी हो रही है- वो पच्चीस हजार रुपये कमाता है. कम कमाई से ज़्यादा कमाई तक.... लड़कों ने सिर्फ प्रेमिकाएं खोईं. इन लड़कों को प्रेमिकाएं नहीं मिलीं और जो मिलीं...वो लड़कों की गलतफहमी का शिकार होकर किसी दूसरे के लिए शादी वाली दोपहर को ब्यूटीपार्लर में फुलबॉडी वैक्स करवाने चली गईं.

कुछ लड़के ऐसे भी हुए जो किसी दूसरे की प्रेमिका को चूमते हुए अक्सर ये सोचते कि ये मेरी प्रेमिका क्यों नहीं है. तब जबकि वो लड़की थी तो लड़के की ही  प्रेमिका...लेकिन वो प्रेमिका नहीं थी. कुछ और थीं, जिसको सालों साल 'ऑक्सफोर्ड न्यू वर्ड ऑफ द ईयर' आने के बाद भी किसी एक शब्द से एक्सप्लेन न किया जा सका.



ये लड़के नौकरी छोड़कर भागना चाहते थे. लेकिन कभी नहीं भाग पाए. एक नौकरी भी तभी छोड़ पाए, जब दूसरी पक्की हो गई. ये लड़के भूखा मरने से डरते थे. किसी अपने को भूखा मरते देखने से तो सबसे ज़्यादा. इसलिए लड़के चुप रहे और शरीर को आगे ले आए. कुछ पलों के सुखों को हासिल करके ये मान बैठे कि यही सुख होता होगा. लेकिन लड़कों को सुख भागने में सबसे ज्यादा था. जब भी कोई लड़की किसी लड़के के साथ भागी तो एक लड़का पहले भागा था...क्योंकि तय ढांचों की गवाही थी कि ज़िम्मेदारी लड़के उठाएंगे. हां थी इन्हीं लड़कों की कुछ लड़कियां, जो ज़िम्मेदारी उठाने के लिए लड़का बन गईं थीं. ये लड़कियां लड़का बनकर रोना भूल गईं थीं.


इन्ही लड़कों के ज़िम्मे आई कपाल क्रिया. जिसमें बांस किसी अपने की जलती लाश के सिर पर मारना होता था. पंडित कहता- मुक्ति मिलेगा. किसी ने कभी नहीं सोचा...वो बांस ज़िंदगी भर लड़कों की छाती पर गड़ता रहा...जब तक किसी दूसरे लड़के ने उनके जलते कपाल पर बांस नहीं मार दिया.

कुछ लड़के कभी नहीं कह पाए कि वो शादी नहीं करना चाहते. कोई मिली नहीं या कोई खो गई- वो इसमें से कुछ भी नहीं कहना चाहते थे. जवाब वो नहीं जानते थे. वो बस ये जानते थे कि कुछ है अधूरा सा या शायद पूरा सा. जो किसी के आने से पूरा या अधूरा हो जाएगा और जो आएगा...वो इसे कैसे पूरा या अधूरा कर सकता है. इन कुछ लड़कों की बगावतें घर पर काम नहीं आईं और वो ब्यूटीपार्लर से सजकर आई लड़कियों के चिकने स्लेट पर उंगलियों की स्याही खर्च करते हुए बूढ़े होने लगे.

लड़कों को रोना मना था.

टिप्पणियाँ

  1. लड़कों को रोना मना है। आंसू न सही पर हमारे लिए शब्द हैं। और इतना बहुत है।

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  2. विकास जी बहुत शुक्रिया। हमारे सारे जज़्बातों को सही शब्द देने के लिए। हमारे लिए रोना मना है। फिर भी आपके शब्द दिलासा देते हैं।।।

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  3. best line...लड़कों को पति के रूप में तो सबने स्वीकार किया लेकिन प्रेमी के रूप में... बहुत कम ने...ati sundar

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  4. यह दूसरी तस्वीर, जिसमें चट्टान है, क्या भीमबेटका गुफाओं (भोपाल) की तरफ़ जाते हुए, कहीं बीच में खींची गयी है?

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  5. Apni chot ko doosre ladki ke badan pe daal ke dekha..

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