ये दुख ख़त्म होता है बे...

ये दुख ख़त्म होता है बे. बस अपने हिस्से का वक्त लेता है. जब तक ये वक्त पूरा नहीं होता तब तक अपने हिस्सों के मसान वाले घाटों पर बैठा कोई न कोई दीपक कहता रहता है- ये साला ये दुख काहे खत्म नहीं होता है बे? 

कुछ जवाब इंतज़ार की पूरी उम्र जीकर ही हासिल किए जा सकते हैं. प्यार शायद ऐसा ही कोई जवाब होता होगा. 'हमको शायरी पसंद है.' मसान के घाट पर उदास बैठा दीपक जब ये कहता है तो वो प्यार की नुमाइंदगी कर रहा होता है. 



प्यार आपको शायर बनाता है. फिर इससे फर्क नहीं पड़ता कि आपके शेर या मिसरे किसी दूसरे या नुक्ता ज्ञानी को कैसे लगेंगे. या कोई उस पर क्या सोचेगा. बस आपको वो शेर कह गुज़रने होते हैं. जैसे रेल गुज़रती है और पुल थरथराते हैं.

दूर कहीं नीचे बैठे दीपक दुख खत्म होने का इंतज़ार कर रहे होते हैं. फिर एक रोज़ सबसे छिपाकर अपना सुख शुरू करते हैं. एक-दूजे के अतीत को फुर्र कर या शायद पूरा सुनकर, महसूस कर, कुछ मौकों पर जीकर... भविष्य की ओर बढ़ते हैं.

फिर दुनिया को दिखता है कि इंग्लिश मीडियम लड़कियां कैसे किसी देसी लुक, साधारण सूरत जैसे हिंदी मीडियम छाप लड़कों को चुन लेती हैं. 'सूरत नहीं सीरत देखो' जैसी क्लीशे लाइन सदियों से कैसे सर्वाइव कर रही हैं, इसका जवाब ऐसी तस्वीरें देती हैं.

तस्वीर, जिसमें दो लोग हैं. पक्का अपने अपने जीवन में कई बार प्यार कर चुके होंगे. मन ने कितनी बार कहा होगा- ''ये सब मेरे साथ ही क्यों होता है? मेरे साथ धोखा हुआ.''

फिर भी सांसों पर भरोसा किया. ताकि जब सांस टकराने भर की दूरी पर रखे जा सकने वाला कोई टकराए तो उससे कह सकें- ''सांस में तेरी सांस मिली तो मुझे सांस आई... मुझे सांस आई.''

इसलिए जब तक सांस से सांस टकराने भर की दूरी वाला कोई टकरा ना जाए, तब तक हर सुख के आने से पहले टकराते टुख से वही कहिए जो 'संजू' फिल्म में विकी कौशल का किरदार कमलेश रणबीर कपूर से कहता है, ''यही तो टाइम है फाइट करने का... बोल टाइगर हूं मैं. Roar कर Roar.''

क्योंकि ये दुख साला एक दिन तो ख़त्म होता ही है बे.

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